RAAHI
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Ghazal

पागलों की तरह ज़िंदगी हो गई

इश्क़ से जो हमें बे-दिली हो गई

आदतन हम नहीं ख़ुश रहेंगे कभी
उन को हम से बिछड़ कर ख़ुशी हो गई

हम को भी तो कभी प्यार की चाह थी
चाह बढ़ती रही शा'इरी हो गई

यूँ बदल से गए हम जो क्या ही कहें
दोस्तों से बहुत दुश्मनी हो गई

दोपहर को कभी याद आते नहीं
रात तो याद में सुरमई हो गई

जब तलक साथ थी कुछ अलग बात थी
वो गई दूर तो की़मती हो गई

बढ़ रहे थे कदम जो उसी की तरफ़
वो नहीं जो मिली बेरुखी हो गई

खो दिया फिर उसे अब कहाँ वो मिले
कल मिली जो सनम बावली हो गई

हम अदब से मिले और वो बे-अदब
हम गले जो मिले वो दुखी हो गई

शाम की बात थी रात भर जो चली
इक छुवन से ही वापस कली हो गई

आज मुझ को नहीं कोई भी तजरबा
हाँ मगर राज बे-पर्दगी हो गई

— RAAHI

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