मेरे जितना कोई तन्हा नहीं है
मगर तन्हा मुझे मरना नहीं है
पराए शहर में कैसे रहूँ मैं
यहाँ कोई मेरा अपना नहीं है
ज़हाँ भर का लुटाया 'इश्क़ उसपे
कि रत्ती भर भी जो मेरा नहीं है
मुझे आती नहीं दौलत कमानी
सो कोई 'इश्क़ में पड़ता नहीं है
कोई क्यूँ दस्तरस में आए तेरे
तू तो कुछ अच्छा भी लिखता नहीं है
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