वो जो था जान से भी प्यारा मुझे

उस से करना पड़ा किनारा मुझे

ज़िंदगी हाथ से निकलती गई
वक़्त ने तिनका-तिनका मारा मुझे

रस्सियाँ घूरती रहीं मुझ को
पंखे ने देर तक पुकारा मुझे

इश्क़ से यूँ भी दूर रहता हूँ
इश्क़ में होता है ख़सारा मुझे

आज फिर रात-भर नहीं सोया
नींद करती रही इशारा मुझे

जो मुकम्मल करे मेरी ख़्वाहिश
ढूँढ़ना है वो एक तारा मुझे

— ABhishek Parashar

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