पटक के बारहा यादों की लहर आहिस्ता आहिस्ता
ज़मीं को नम किए जाता है बहर आहिस्ता आहिस्ता
यकायक कण्ठ नीले वर्ण का होता है पीते ही
या करता है असर दुनिया का ज़हर आहिस्ता आहिस्ता
भले ही कारख़ाने से निकल आया हो उजलत में
मगर आबाद तो होता है दहर आहिस्ता आहिस्ता
ख़फ़ा यकदम ही हो जाना कहाँ अन्दाज़ है उस का
वो बरसाएगा हम लोगों पे क़हर आहिस्ता आहिस्ता
फिर ऐसे छोड़ के 'फ़ानी' गईं ख़ुशियाँ मुझे सारी
हुए वीरान जैसे कोई शहर आहिस्ता आहिस्ता
— Ananth Faani















