तुझे ये डर कि मिरे बाद तेरा क्या होगा
मुझे ये ग़म कि कोई मुझ सा दूसरा होगा
था जिन शदीद अज़ाबों में मुब्तला ये दिल
लगा ही था कि मोहब्बत ही मस'अला होगा
इस एक बात से बहला रहा हूँ अब दिल को
कहीं से वो भी ये महताब देखता होगा
ये दर खुला है जो मन हो तो लौट आना मगर
हमारे क़ुर्ब में अब एक फ़ासला होगा
मुआ'फ़ करते हुए तुझ को होंठ काँपेंगे
जो रोज़-ए-हश्र तिरा मुझ से सामना होगा
मुझे तो याद नहीं मेरा कुछ क़ुसूर था पर
तू कह रहा है तो फिर सारा ही मिरा होगा
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