इख़्तिलाफ़ात में पोशीदा मोहब्बत रक्खो
दिल मिले या न मिले सब से रिफ़ाक़त रक्खो
ज़िन्दगी में न कोई शौक़-ए-सियासत रक्खो
शौक़ रखना है तो फिर शौक़-ए-शहादत रक्खो
ज़ुल्म करता है कोई लाख़ करे करने दो
तुम भी आँखों में मगर अर्श-ए-बगावत रक्खो
ख़ाक में क्यूँ न मिला दे ये ज़माना लेकिन
अपने हर क़ौल में तुम अद्ल-ओ-सदाक़त रक्खो
इस ज़माने में अगर तुम को ग़नी बनना है
दिल में ईमान की दौलत को सलामत रक्खो
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