chehre men chhupe doosre chehre nahin khole | चेहरे में छुपे दूसरे चेहरे नहीं खोले

  - Haider Khan

चेहरे में छुपे दूसरे चेहरे नहीं खोले
लोगों ने अभी आख़री पत्ते नहीं खोले

ऐसा तो नहीं है कि फ़क़त मैं ही हूँ ग़मगीं
उसने भी अभी रूह के टाँके नहीं खोले

मेरा भी कभी उसके बिना दिन नहीं कटता
उसने भी मेरे बिन कभी रोज़े नहीं खोले

मालूम हमें भी हैं कई राज़ तुम्हारे
पर हमने तुम्हारे कभी किस्से नहीं खोले

बस एक यही ग़म है जो खाता है मुझे अब
तूने तो अभी तक मेरे तोहफ़े नहीं खोले

कमरे में मेरे क़ैद हैं यादें जो तुम्हारी
वो साथ रहें इसलिए ताले नहीं खोले

आज़ाद थे दोनों कोई पाबंदी नहीं थी
पर हमने कभी 'इश्क़ में तस्में नहीं खोले

बस जुर्म यही था के मैं बेज़ार था फिर भी
आँखों के कभी मैंने ये चश्में नहीं खोले

दुश्मन ये समझता है के मैं हार चुका हूँ
मैंने तो अभी कीमती मोहरे नहीं खोले

  - Haider Khan

Sazaa Shayari

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