मैं जो दिन बोलूँ तो वो रात समझ लेता है

मैं समझता था मेरी बात समझ लेता है

मैं कि मिल-मिल के बिछड़ जाता हूँ उस से और वो
ऐसे मिलने को मुलाक़ात समझ लेता है

कुछ तो अज्दाद की आदात भी होती हैं बुरी
ना-समझ जिन को रिवायात समझ लेता है

मेरी हर बात पे कहता है कि कहते क्या हो
फिर ये कहता है कि जज़्बात समझ लेता है

हम मोहब्बत में गिराते हैं अना की दीवार
और ज़माना है कि औक़ात समझ लेता है

मशवरे देता हूँ अपना ही समझ कर तुझ को
और तू है कि शिकायात समझ लेता है

— Haider Khan

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