ये रात कर दो कैद कोई, रौशनी करो
इसका है इक इलाज यही, रौशन करो
हाकिम ने तीरगी की शिकायत पे ये कहा
अपने मकाँ जला के सभी रौशनी करो
ग़फ़लत में काट कर के गया था जो ज़िन्दगी
उस क़ब्र से सदा ये उठी, रौशनी करो
रौशन चराग़-ए-इल्म को रखना है गर तो फिर
बुझते दियों से एक नई रौशनी करो
सूरज सा तेज होगा जलेंगे जो साथ में
इक इक चराग़ से ही सही, रौशनी करो
कहते हैं लोग नूर है चेहरे पे आपके
दिल में भी अपने जा के कभी रौशनी करो
तन्हा किया है मुझ को अँधेरों ने आज फिर
परछाईं साथ लाओ मिरी, रौशनी करो
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