अज़ाब होगी न ला'नत न बद-दुआ' होगी

तेरे बग़ैर मगर ज़िंदगी भी क्या होगी

कुछ इस तरह थी रवानी कि देख कर उस को
समझ गया था मैं नद्दी ये अब जुदा होगी

निकल के पिंजरे से दुनिया में हो गई वो क़ैद
समझ रही थी जो बुलबुल कि वो रिहा होगी

जहाँ तमाम ज़ख़ीरा रखा है ख़ुशियों का
वहीं कहीं से उदासी की इब्तिदा होगी

ये हँसते लोग मुझे सुनते-सुनते रोने लगे
किसे ख़बर थी कहानी ये क्या से क्या होगी

मैं तुझ को पाने की रब से दुआ करूँ कैसे
तेरे लिए ये दुआ भी तो बद-दुआ' होगी

— Haider Khan

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