जो ज़बाँ देते हैं फिर उस से मुकर जाते हैं
लाख़ अच्छे हों निग़ाहों से उतर जाते हैं
हाल जब हमको पता करना हो तेरा जानाँ
हम सबा बन के तिरे दर से गुज़र जाते हैं
जब कभी लब पे सजा कर के तबस्सुम वो चलें
आइने हो के हयादार बिखर जाते हैं
ये तिलिस्मी है कि वो फूल नहीं हैं फिर भी
हम से काँटों की रिफ़ाक़त में सँवर जाते हैं
बज़्म-ए-जानाँ में मिरा नाम पुकारें जब वो
कितने चेहरों के यहाँ रंग उतर जाते हैं
जब कभी कूचा-ओ-बाज़ार से उनका हो गुज़र
दिल को था
में हुए सब लोग ठहर जाते हैं
ग़म के पैमाने यूँँ तो ख़ाली ही रहते हैं मगर
गाहे-गाहे ये तिरी यादों से भर जाते हैं
रोज़ सोचूँ कि तुझे अब न सितमगर मैं कहूँ
फिर तिरे मुझको दिए ज़ख़्म उभर जाते हैं
क़ैस-ओ-फ़रहाद थे इक 'इश्क़ पे मरते थे जो
लोग अब 'इश्क़ बदलते हुए मर जाते हैं
इस क़दर हमको है तन्हाई की आदत "हैदर"
अपना ही साया अगर देख लें, डर जाते हैं
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