ख़त
मैं रात था वो के जिस
में तुम ने छुपाए थे सारे अश्क अपने
तुम्हारे आँगन की वो सुब्ह था के जिस
में तुम मुस्कुरा रही थी
मैं साज़ था वो पनाह जिस की तुम्हारे हाथों की नर्मियाँ थीं
मैं गीत था वो के जिस को इतनी ख़ुशी से तुम गुनगुना रही थी
मैं साथ था हर क़दम तुम्हारे मैं अक्स जैसे के बन गया था
मगर जो अब हम बिछड़ चुके हैं तो ख़ुद को तुम अब सँभाल लेना
अगर कभी मैं जो याद आऊँ तो मेरा ख़त तुम निकाल लेना
उसे जो पढ़ना तो फिर ख़ुशी से उसे हवा में उछाल देना
वो सारी बातें जो मैं ने उस
में लिखी हैं जाना वो जी उठेंगी
हिना सी ख़ुशबू महक उठेगी, फ़ज़ा में बाद-ए-सबा चलेगी
तुम्हारे लब मुस्कुरा उठेंगे, तुम्हारी आँखों में अश्क होंगे
तुम्हारी यादों के मोड़ पर मैं खड़ा मिलूँगा तुम्हें उसी पल
हमारी क़ुर्बत के सारे लम्हे हमारी मजबूरियों का आलम
वो सारी बातें जो हम पे गुज़रीं वो ख़त में मेरे लिखी हुई हैं
तुम्हारी मख़मूर सी वो आँखें तुम्हारी ख़ुशबू तुम्हारी यादें
अभी भी जैसे ग़ुलाब बन कर मेरी ग़ज़ल में खिली हुई हैं















