झुक के चलता हूँ कि क़द उस के बराबर न लगे

दूसरा ये कि उसे राह में ठोकर न लगे

ये तेरे साथ तअ'ल्लुक़ का बड़ा फ़ाइदा है
आदमी हो भी तो औक़ात से बाहर न लगे

नीम तारीक सा माहौल है दरकार मुझे
ऐसा माहौल जहाँ आँख लगे डर न लगे

माँओं ने चूमना होते हैं बुरीदा सर भी
उस से कहना कि कोई ज़ख़्म जबीं पर न लगे

ये तलबगार निगाहों के तक़ाज़े हर सू
कोई तो ऐसी जगह हो जो मुझे घर न लगे

ये जो आईना है देखूँ तो ख़ला दिखता है
इस जगह कुछ भी न लगवाऊँ तो बेहतर न लगे

तुम ने छोड़ा तो किसी और से टकराऊँगा मैं
कैसे मुमकिन है कि अंधे का कहीं सर न लगे

— Umair Najmi

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Rahbar Shayari

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