कुछ तो अपनी नासमझी थी कुछ उस कीधीरे धीरे इक दूजे से दूर हुएरस्म रिवाज़ो ने कतरे हैं पंख कईसब तो रिश्तों के आगे मजबूर हुए— Umesh Maurya