इन रगों में कोई तो ज़हर भरा जाता है
जब कोई लम्हा तेरी याद दिला जाता है
दोनों के बीच का ये फ़ासिला तो है और अजीब
जितना कम करता हूँ उतना ही बढ़ा जाता है
मैं तो ये चाहता भी हूँ कि रहूँ अब न उदास
दर्द की लौ को मगर कोई जला जाता है
ऐ मेरे दिल तू परेशान है क्यूँ इस दर्जा
कम बस इक शख़्स ही तो घर से हुआ जाता है
अपनों की नज़रों में पत्थर ही रहेगा वो 'हरेश'
जो ख़ुदा लोगों की बस्ती में कहा जाता है
— Haresh Vanza















