सच बताएँ तो शर्म आती है
और छुपाएँ तो शर्म आती है
हम पे एहसान हैं उदासी के
मुस्कुराएँ तो शर्म आती है
हार की ऐसी आदतें हैं हमें
जीत जाएँ तो शर्म आती है
उस के आगे ही उस का बख़्शा हुआ
सर उठाएँ तो शर्म आती है
ऐश औकात से ज़्यादा की
अब कमाएँ तो शर्म आती है
धमकियाँ ख़ुद-कुशी की देते हैं
कर न पाएँ तो शर्म आती है
— Varun Anand















