सच बताएँ तो शर्म आती है
और छुपाएँ तो शर्म आती है
हम पे एहसान हैं उदासी के
मुस्कुराएँ तो शर्म आती है
हार की ऐसी आदतें हैं हमें
जीत जाएँ तो शर्म आती है
उसके आगे ही उसका बख़्शा हुआ
सर उठाएँ तो शर्म आती है
ऐश औकात से ज्यादा की
अब कमाएँ तो शर्म आती है
धमकियाँ ख़ुदकुशी की देते हैं
कर न पाएँ तो शर्म आती है
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