ye bahs chhod ki kitni haseen hai duniya | ये बहस छोड़ कि कितनी हसीन है दुनिया

  - Vijay Sharma

ये बहस छोड़ कि कितनी हसीन है दुनिया
तू ये बता कि तेरा दिल कहीं लगा कि नहीं

  - Vijay Sharma

Dil Shayari

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    हमने जिस मासूम परी को अपने दिल की जाँ बोला था
    उसने हमको धोखा देकर और किसी को हाँ बोला था

    सारे वादे भूल गई तुम कोई बात नहीं जानेमन
    लेकिन ये कैसे भूली तुम मेरी माँ को माँ बोला था
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    Tanoj Dadhich
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    तुम्हें इक मश्वरा दूँ सादगी से कह दो दिल की बात
    बहुत तैयारियाँ करने में गाड़ी छूट जाती है
    Zubair Ali Tabish
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    गले मिलना न मिलना तो तेरी मर्ज़ी है लेकिन
    तेरे चेहरे से लगता है तेरा दिल कर रहा है
    Tehzeeb Hafi
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    दिल हारने के बाद ही आता है ये सुख़न
    अब तक किसी ने कोख से शायर नहीं जना
    Anas Khan
    हम तो कुछ देर हँस भी लेते हैं
    दिल हमेशा उदास रहता है
    Bashir Badr
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    जितने भी हैं ज़ख़्म तुम्हारे सिल देगी
    होटल में खाने का आधा बिल देगी

    सीधे मुंह जो बात नहीं करती है जो
    तुमको लगता है वो लड़की दिल देगी
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    Shadab Asghar
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    इतनी सारी यादों के होते भी जब दिल में
    वीरानी होती है तो हैरानी होती है
    Afzal Khan
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    अगर हमारे ही दिल में ठिकाना चाहिए था
    तो फिर तुझे ज़रा पहले बताना चाहिए था
    Shakeel Jamali
    41 Likes
    हर दुःख का है इलाज, उसे देखते रहो
    सबकुछ भुला के आज उसे देखते रहो

    देखा उसे तो दिल ने ये बे-साख़्ता कहा
    छोड़ो ये काम काज उसे देखते रहो
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    Aslam Rashid
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    नहीं ये फ़िक्र कोई रहबर-ए-कामिल नहीं मिलता
    कोई दुनिया में मानूस-ए-मिज़ाज-ए-दिल नहीं मिलता
    Asrar Ul Haq Majaz
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More by Vijay Sharma

As you were reading Shayari by Vijay Sharma

    जिस भी जगह देखी उस ने अपनी तस्वीर हटा ली थी
    मेरे दिल की दीवारों पर दीमक लगने वाली थी

    एक परिंदा उड़ने की कोशिश में गिर गिर जाता था
    घर जाना था उस को पर वो रात बहुत ही काली थी

    आँगन में जो दीप क़तारों में रक्खे थे धुआँ हुए
    हवा चली उस रात बहुत जब मेरे घर दीवाली थी

    इक मुद्दत पर घर लौटा था पास जब उस के बैठा मैं
    मुझ में भी मौजूद नहीं थी वो ख़ुद में भी ख़ाली थी

    'अर्श' बहारों में भी आया एक नज़ारा पतझड़ का
    सब्ज़ शजर के सब्ज़ तने पर इक सूखी सी डाली थी
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    Vijay Sharma
    शहर बेज़ार रहगुज़र तन्हा
    ज़िंदगी उठ चली किधर तन्हा

    मेरी रग-रग में धूल रक़्साँ है
    मुझ में मौजूद है खंडर तन्हा

    दश्त की ना-तमाम राहों पर
    कोई साथी है तो शजर तन्हा

    तेरी आहट सजा के पलकों पर
    ढूँढती है तुझे नज़र तन्हा

    हो के बे-नूर रात कहलाई
    चाँद को ढूँढती सहर तन्हा

    संग भी दिल भी और ठोकर भी
    'अर्श' तन्हा न ये सफ़र तन्हा
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    Vijay Sharma
    बातों बातों में ही उनवान बदल जाते हैं
    कितनी रफ़्तार से इंसान बदल जाते हैं

    चोरियाँ हो नहीं पातीं तो यही होता है
    अपनी बस्ती के निगहबान बदल जाते हैं

    कोई मंज़िल ही नहीं ठहरें मुरादें जिस पर
    वक़्त बदले भी तो अरमान बदल जाते हैं

    उस के दामन से उमीदों के गुलों को चुन कर
    ज़िंदगी के सभी इम्कान बदल जाते हैं
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    Vijay Sharma
    तिरे ग़ुरूर मिरे ज़ब्त का सवाल रहा
    बिखर बिखर के तुझे चाहना कमाल रहा

    वहीं पे डूबना आराम से हुआ मुमकिन
    जहाँ पे मौज-ओ-सफ़ीने में ए'तिदाल रहा

    नहीं कि शाम ढले तुम न लौटते लेकिन
    तुम्हारी राह में सूरज ही ला-ज़वाल रहा

    फिर अपना हाथ कलेजे पे रख लिया हम ने
    फिर उस के पाँव की आहट का एहतिमाल रहा
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    Vijay Sharma
    बारा चाँद गए पूनम के प्यार भरा इक सावन भी
    गए दिनों में साल भी गुज़रा और गया कुछ जीवन भी

    जश्न जीत का कौन मनाए कौन उठाए हार का ग़म
    अक्स मिरा भी बिखरा सा है टूट गया वो दर्पन भी

    मेरे क़द को मापने वाले शायद तुझ को याद नहीं
    उँगली पर ही उठ जाता है कभी कभी गोवर्धन भी

    पहले तू आग़ाज़-ए-सफ़र कर फिर तारों की दूकानों से
    बाली बुंदे झुमके पायल ले दूँगा मैं कंगन भी

    उस को छू कर लौट रहा हूँ महक रहा है जिस्म ऐसे
    जैसे महक रही हो धूनी कस्तूरी और चंदन भी
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    Vijay Sharma

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