कोई शिकवा न ही गिला कोई
यूँ ही इक दिन चला गया कोई
अब फ़क़त फैसले सुनाता है
पहले करता था मशवरा कोई
ख़त में बस इतना ही लिखा उस ने
आपने ख़त नहीं लिखा कोई
ज़र्द पत्ते सा गिर रहा हूँ मैं
हो रहा है कहीं हरा कोई
एक दिन मैं ने ली किसी की जगह
आ गया अब मिरी जगह कोई
— Vikram Sharma















