haakim ko ik chitthi likkho sab ke sab | हाकिम को इक चिट्ठी लिक्खो सब के सब

  - Varun Anand

हाकिम को इक चिट्ठी लिक्खो सब के सब
और उसमें बस इतना लिखना लानत है

  - Varun Anand

Khat Shayari

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    क्या बोला मैंने कुछ समझा? पागल बन

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    और छुपाएँ तो शर्म आती है

    हम पे एहसान हैं उदासी के
    मुस्कुराएँ तो शर्म आती है

    हार की ऐसी आदतें हैं हमें
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    सर उठाएँ तो शर्म आती है

    ऐश औकात से ज्यादा की
    अब कमाएँ तो शर्म आती है

    धमकियाँ ख़ुदकुशी की देते हैं
    कर न पाएँ तो शर्म आती है
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    किसी के जानी दुशमन हैं किसी के यार हैं हम लोग

    मुहब्बत कर तो लेते हैं मगर मजबूरियों के साथ
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    उसे कहना कई दिन से बड़े बीमार हैं हम लोग

    दरो- दीवार से रिश्ता बनाकर दुख ही होना है
    हमारा घर नहीं है ये किराएदार हैं हम लोग

    हमारे जिस्म पर दुनिया का इक बाज़ार चस्पाँ है
    किसी सरकारी बिलडिंग की कोई दीवार हैं हम लोग

    कहीं क़समें निभाते हैं कहीं पर तोड़ देते हैं
    कहीं ईमान वाले हैं कहीं गद्दार हैं हम लोग
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    Varun Anand

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