धरती माता आकाश पिता मैं मिट्टी में जन्मा, खेला,पनपा एक देवदार

जिस ने खोली बाँहें अपार बाँटा प्रकृति का अमिट प्यार
जिस ने मिट्टी ढहते देखी जिस ने बादल फटते देखे
जिस ने जंगल की आग सही जिस की कुलमाता नदी रही
जिस की छाया में बैठे कितने पथिक कई सैलानी भी
कुछ चरवाहे, कुछ लेखक भी, कुछ दीवाने, कुछ ध्यानी भी
कुछ पर आता था प्रेम मुझे कुछ पर होती हैरानी भी
मैं नित्य सूर्य के ताप को छूने आगे बढ़ता
मैं नित्य प्रयासों से कितनी ऊँचाई चढ़ता
सर्दी की धूप पड़ी जब जब मेरे स्वर्णिम पत्ते चमके
मुझ से मिल कर ही रंग खिले हर आने वाले मौसम के
निचली घाटी के लोगों तक मेरे कुछ गीत पहुँच पाते
पर हवा उड़ा ले जाती थी सब गीत मेरे अंतरतम के
मैं मौन रहा
विस्मय से सुनता रहता था
व्याकुल से हिरणों की पुकार
मैं ने क़रीब से देखा बाघिन का शिकार
मैं मिट्टी में जन्मा, खेला, पनपा एक देवदार जिस ने खोली बाँहें अपार

— Vikram Gaur Vairagi

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