रोज़ इक काम रह जाता है
जब तिरा नाम रह जाता है
जिस्म बिकता यहाँ रात भर
रूह का दाम रह जाता है
चैन से बैठ तो लेते हैं
बस ये आराम रह जाता है
हाल तो भेजता है मगर
एक पैग़ाम रह जाता है
नाम अपना बनाने में भी
कोई गुमनाम रह जाता है
— Vishesh asthana
जब तिरा नाम रह जाता है
जिस्म बिकता यहाँ रात भर
रूह का दाम रह जाता है
चैन से बैठ तो लेते हैं
बस ये आराम रह जाता है
हाल तो भेजता है मगर
एक पैग़ाम रह जाता है
नाम अपना बनाने में भी
कोई गुमनाम रह जाता है
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