फ़िराक़-ए-यार में ख़ुद को तमाम करते हुए

मैं रो रहा हूँ ख़ुशी ग़म के नाम करते हुए

यूँ तेरी याद है आती कि जैसे गलियों से
बरात गुज़रे कोई धूम-धाम करते हुए

वही तो होता है हर पल मिरे तख़य्युल में
मैं शे'र कहता हूँ उस से कलाम करते हुए

मैं क़ैस हूँ सो मुझे दश्त में ही रहने दो
नहीं जी पाऊँगा ये ताम-झाम करते हुए

ऐ इश्क़ मान लिया थोड़ी अपनी ग़लती थी
ज़रा सा सोच तो जीना हराम करते हुए

— Vivek Bijnori

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