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किसी ख़याल को अशआ'र में पिरोते हुए  - Vivek Bijnori

किसी ख़याल को अशआ'र में पिरोते हुए
सिसक रहा था मैं काग़ज़ पे हर्फ़ बोते हुए

मुझे ये ग़म नहीं महफ़िल में हो के तन्हा हूँ
मुझे ये दुख है मैं तन्हा हूँ तेरे होते हुए

अजीब ख़्वाब दिखाई दिया मुझे कल शब
मैं हड़बड़ा के उठा डर रहा था सोते हुए

वही जो मुझ को क़सम देता था न रोने की
मुझे वो छोड़ गया आस्तीं भिगोतें हुए

ये मशवरा है मिरे दोस्त रख ख़याल अपना
कहीं तू डूब न जाना मुझे डुबोते हुए

Vivek Bijnori
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