पहले दिन मरने जैसी हालत है
हिज्र है तेरा या क़यामत है
रूह तो ख़ुश है तेरी यादों से
पर बदन को तेरी ज़रूरत है
ये मुलाक़ात इत्तिफ़ाक़ नहीं
मेरे पूरे बरस की मेहनत है
तू भी कुछ ठीक कर नहीं सकती
तेरे दीवाने की वो हालत है
तू जहाँ है वहाँ नहीं हूँ मैं
अपनी मौजूदगी पे लानत है
जिस्म से ज़्यादा ज़ेहन थकता है
शे'र कहना भी एक कसरत है
कारोबार-ए-सुख़न में जान-ए-ग़ज़ल
बस तुम्हारे ही ग़म से बरकत है
क्या कहूँ मुझ को तुम से क्या क्या है
प्यार है इश्क़ है मोहब्बत है
— Viru Panwar Viyogi















