ज़िंदगी इस तरह गुज़ारी है
जैसे सर से बला उतारी है
मुझ से मिल और मेरा क़र्ज़ चुका
तुझ पे मेरी वफ़ा उधारी है
जो तेरे शहर की नदी है वो
मेरे ही आँसुओं से जारी है
जैसा छोड़ा था तू ने वैसा ही हूँ
अपनी हालत नहीं सुधारी है
किसी के साथ हों भले कहीं हों
हम बस उस के हैं वो हमारी है
मेरी तन्हाई और तेरी कमी
दोनों में कितनी पक्की यारी है
उम्र का आख़िरी पड़ाव है और
ज़ेहन पर पहला इश्क़ तारी है
— Viru Panwar Viyogi














