अगर रस्मन ही अब मैं याद आऊँगातुझे इग्नोर कर के लौट जाऊँगाअगर वन काटने का ख़्वाब भी आयासुनो! कश्ती नहीं काग़ज बनाऊँगा— Vijay Potter Singhadiya