खींच कर रात की दीवार पे मारे होते

मेरे हाथों में अगर चाँद सितारे होते

हमने इक दूजे को ख़ुद हार दिया दुख है यही
काश हम दुनिया से लड़ते हुए हारे होते

ये जो हम लोग हैं एहसास में जलते हुए लोग
हम ज़मीं-ज़ाद न होते तो सितारे होते

यार क्या जंग थी जो हार के तुम कहते हो
जीत जाते तो ख़सारे ही ख़सारे होते

ये जो आँसू हैं मेरी पलकों पे पानी जैसे
उस की आँखों से उभरते तो सितारे होते

इतनी हैरत तुम्हें मुझ पर नहीं होनी थी अगर
तुमने कुछ रोज़ मेरी तरह गुज़ारे होते

तुम को इंकार की खू मार गई है 'वाहिद'
हर भँवर से न उलझते तो किनारे होते

— Wahid Ejaz Meer

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