है अजब बात सभी शोर मचा कर खु़श हैं
भेद उल्फ़त का ज़माने को बता कर खु़श हैं
इश्क़ सरगम है जो धड़कन की धुनों पर बाजे
सुर को समझे ही नहीं ढोल बजा कर खु़श हैं
प्यार करने को तो इक उम्र भी कम है 'साहिल'
लोग इक रोज़ फ़क़त जश्न मना कर खु़श हैं
— Wajid Husain Sahil















