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ये दर्द समझता नहीं आदाब-ए-ज़माना
कोशिश हो छुपाने की तो होता है अयाँ और
क़िस्मत का लिखा मान ले थोड़े से ज़ियाँ को
जाएगा अदालत में तो पाएगा ज़ियाँ और
तफ़्सील बयाँ करता है क्यूँ अपने अमल की
इस तरह तो हर शख़्स पे गुज़रेगा गुमाँ और
मंज़िल पे पहुँच कर न हुआ दिल जो मिरा ख़ुश
पूछी जो वज्ह उस ने कहा और अमाँ और
तुम से भी कहाँ मुझ को समाअ'त की तवक़्क़ो
मुझ में भी कहाँ बाक़ी है अब ताब-ए-फ़ुग़ाँ और
ये ज़ुल्म के शो'ले हैं फ़क़त ख़ूँ से बुझेंगे
अश्कों से बुझाओगे तो उट्ठेगा धुआँ और
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बहारों के नए मौसम बुलाते रह गए
नज़र में तू रहा हम जाते जाते रह गए
नज़र में तू रहा हम जाते जाते रह गए
दीवाना एक दिल की बात कह कर चल दिया
मोहज़्ज़ब लोग सारे कसमसाते रह गए
किसी ने हाल पूछा था बस इतनी बात थी
मिरी आँखों में आँसू आते आते रह गए
बहुत चर्चे थे जिस दर की सख़ावत के यहाँ
वो औरों पर खुला हम सर झुकाते रह गए
वो पहले मुस्कुराए फिर लिया पहलू बदल
हमीं नादान थे बस मुस्कुराते रह गए
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कभी मसरूफ़ था मैं आज-कल फ़ुर्सत में रहता हूँ
अकेला हूँ सो अपनी ज़ात की वुसअ'त में रहता हूँ
जो तू ने आग बख़्शी है उसी में जल रहा हूँ मैं
है तेरे क़ुर्ब की चाहत इसी चाहत में रहता हूँ
न कुछ पाने की हसरत है न कुछ खोने का ख़तरा है
बहुत बे-ख़ौफ़ हो कर मैं तिरी सोहबत में रहता हूँ
निकल आया हूँ मैं 'आलोक' दुनिया के झमेलों से
नई बेदारियाँ हैं फ़िक्र की जन्नत में रहता हूँ
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भरे जो ज़ख़्म तो दाग़ों से क्यूँ उलझें?
गई जो बीत उन बातों से क्यूँ उलझें?
गई जो बीत उन बातों से क्यूँ उलझें?
उठा कर ताक़ पे रख दें सभी यादें
नहीं जो तू तिरी यादों से क्यूँ उलझें?
ख़ुदा मौजूद है जो हर जगह तो फिर
अक़ीदत-केश बुतख़ानों से क्यूँ उलझें?
ये माना थी बड़ी काली शब-ए-फ़ुर्क़त
सहर जब हो गई रातों से क्यूँ उलझें?
हवाएँ जो गुलों से खेलती थीं कल
मिरे महबूब की ज़ुल्फ़ों से क्यूँ उलझें?
इसी कारन नहीं रोया तिरे आगे
मिरे आँसू तिरी पलकों से क्यूँ उलझें?
नदी ये सोच कर चुप-चाप बहती है
सदाएँ उस की वीरानों से क्यूँ उलझें?
उन्हें क्या वास्ता 'आलोक'-जी ग़म से
गुलों के आश्ना ख़ारों से क्यूँ उलझें?
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भटका करूँगा कब तक राहों में तेरी आ कर
तुझ को भुला सुकूँ मैं मेरे लिए दुआ कर
तुझ को भुला सुकूँ मैं मेरे लिए दुआ कर
कब तक ये तेरी हसरत कब तक ये मेरी वहशत
इन सारी बंदिशों से मुझ को कभी रिहा कर
एक उम्र से तुझे मैं बे-उज़्र पी रहा हूँ
तू भी तो प्यास मेरी ऐ जाम पी लिया कर
कल रात ज़िंदगी ये मुझ से तड़प के बोली
कुछ देर को तो हो कर मेरा भी तू रहा कर
रिश्ते कई सुनहरे इस ज़िंदगी से पाए
रक्खा मगर न हम ने उन को कभी बचा कर
दिल के खंडर से पंछी यादों के जा न पाए
देखा है हम ने उन को कितनी ही बार उड़ा कर
वो क़ुर्ब हो कि दूरी सब ख़्वाहिशें अधूरी
'आलोक' आ गए हैं दरिया में हम बहा कर
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इक ज़रा सी चाह में जिस रोज़ बिक जाता हूँ मैं
आइने के सामने उस दिन नहीं आता हूँ मैं
आइने के सामने उस दिन नहीं आता हूँ मैं
रंज ग़म उस से छुपाता हूँ मैं अपने लाख पर
पढ़ ही लेता है वो चेहरा फिर भी झुटलाता हूँ मैं
क़र्ज़ क्या लाया मैं ख़ुशियाँ ज़िंदगी से एक दिन
रोज़ करती है तक़ाज़ा और झुंझलाता हूँ मैं
हौसला तो देखिए मेरा ग़ज़ल की खोज में
अपने ही सीने में ख़ंजर सा उतर जाता हूँ मैं
दे सज़ा-ए-मौत या फिर बख़्श दे तू ज़िंदगी
कश्मकश से यार तेरी सख़्त घबराता हूँ मैं
मौन वो पढ़ता नहीं और शब्द भी सुनता नहीं
जो भी कहना चाहता हूँ कह नहीं पाता हूँ मैं
ख़्वाब सच करने चला था गाँव से मैं शहर को
नींद भी खो कर यहाँ 'आलोक' पछताता हूँ मैं
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पुकारता है मुझे कौन मेरे माज़ी से
कि आज रुख़ पे मिरे छा गई शफ़क़ फिर से
ख़फ़ा ख़फ़ा से हैं आख़िर जनाब-ए-नासेह क्यूँ
किसी ने कर दिया क्या आज ज़िक्र-ए-हक़ फिर से
किसी से रूठ गए या किसी का दिल तोड़ा
जबीं पे आ गया क्यूँ आप की अरक़ फिर से
मियान-ए-दिल कोई लेती है टीस अँगड़ाई
वही है रंज वही ग़म वही क़लक़ फिर से
न निकलो चाँदनी रातों में कितनी बार कहा
हुआ है चाँद के चेहरे का रंग फ़क़ फिर से
बस एक तजरबा काफ़ी है ज़िंदगी के लिए
पढ़ा न जाएगा हम से वही सबक़ फिर से
यही निज़ाम-ए-ज़माना यही तग़य्युर है
जो सहल है वही हो जाएगा अदक़ फिर से
कहीं क़रीब ही बादल बरसते हैं 'आलोक'
हवाएँ लाई हैं ख़ुनकी की कुछ रमक़ फिर से
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