चश्म-ए-तमन्ना
जिसे नींद आई थी सदियों की बीमारियों की थकन से
जिसे नींद आई थी सदियों की बीमारियों की थकन से
जाग उट्ठी है शायद
बदन में नया दिन शगूफ़े की मानिंद उभरा
शफ़क़-ज़ार बन कर
दिल की आग़ोश में आ बसा है
नज़ारे में मसहूर रहने की ख़्वाहिश जनम ले रही है
बसा कर उसे अपनी नज़रों में
शादाब आँखों में रहने को जी चाहता है
वही रंग-ओ-बू की हरारत की हल्की लकीरें
तमाज़त के झोंके बदन छू रहे हैं
बहार आ गई याद की वादियों में
सफ़र के इरादों से मायूस कश्ती
किनारे पे यूँ आ लगी है
कि ठहरी हुई झील की रौशनी में नया घर बसा है
ये चश्म-ए-तमन्ना की कश्ती बनी है नया आशियाना
नीलगूँ रौशनी तैरती है
मगर ये खड़ी है
ज़माने मोहब्बत के फिर लौट आए हैं शायद
वक़्त के ठहर जाने की शायद घड़ी है
क़यामत कड़ी है
Read Fullबदन में नया दिन शगूफ़े की मानिंद उभरा
शफ़क़-ज़ार बन कर
दिल की आग़ोश में आ बसा है
नज़ारे में मसहूर रहने की ख़्वाहिश जनम ले रही है
बसा कर उसे अपनी नज़रों में
शादाब आँखों में रहने को जी चाहता है
वही रंग-ओ-बू की हरारत की हल्की लकीरें
तमाज़त के झोंके बदन छू रहे हैं
बहार आ गई याद की वादियों में
सफ़र के इरादों से मायूस कश्ती
किनारे पे यूँ आ लगी है
कि ठहरी हुई झील की रौशनी में नया घर बसा है
ये चश्म-ए-तमन्ना की कश्ती बनी है नया आशियाना
नीलगूँ रौशनी तैरती है
मगर ये खड़ी है
ज़माने मोहब्बत के फिर लौट आए हैं शायद
वक़्त के ठहर जाने की शायद घड़ी है
क़यामत कड़ी है
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कौन आया है
ये किस ने फूँक कर रखे क़दम
ये किस ने फूँक कर रखे क़दम
दहलीज़ पर चुप-चाप चोरों की तरह
रात की तारीकियों में सरसराहट साँप की
साँस को सीने के अंदर रोक लो
सुन न ले क़दमों की आहट
दिल की धड़कन को कहो चुप साध ले
दिल का दर वा तो न था
पर वो तो दरवाज़े से अंदर आ गया
उस ने दस्तक भी न दी
एक साए की तरह है साथ साथ
क्या करें किस को बुलाएँ
क्या कहें ये कौन है
चुप-चाप बे-आवाज़
गुम-सुम सामने बैठा हुआ
यूँ तो सब कुछ है
अगर सोचो तो ये कुछ भी नहीं
वहम-ओ-गुमाँ
कौन अब ढूँडे उसे
वो तो आ कर रात की तारीकियों में
इस तरह घुल-मिल गया
जैसे अपना जिस्म हो उस का लिबास
हम ने देखा है उसे
जो ख़ुद से भी रू-पोश है
वो हमारी रूह की गर्दिश में है
और हमारे जिस्म से सैराब है
अब अगर तुम सो सको तो सो रहो
अब वो जाएगा कहाँ
अब वो शायद फिर न आएगा कभी
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साँस को सीने के अंदर रोक लो
सुन न ले क़दमों की आहट
दिल की धड़कन को कहो चुप साध ले
दिल का दर वा तो न था
पर वो तो दरवाज़े से अंदर आ गया
उस ने दस्तक भी न दी
एक साए की तरह है साथ साथ
क्या करें किस को बुलाएँ
क्या कहें ये कौन है
चुप-चाप बे-आवाज़
गुम-सुम सामने बैठा हुआ
यूँ तो सब कुछ है
अगर सोचो तो ये कुछ भी नहीं
वहम-ओ-गुमाँ
कौन अब ढूँडे उसे
वो तो आ कर रात की तारीकियों में
इस तरह घुल-मिल गया
जैसे अपना जिस्म हो उस का लिबास
हम ने देखा है उसे
जो ख़ुद से भी रू-पोश है
वो हमारी रूह की गर्दिश में है
और हमारे जिस्म से सैराब है
अब अगर तुम सो सको तो सो रहो
अब वो जाएगा कहाँ
अब वो शायद फिर न आएगा कभी
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चलो हवा के साथ चलें
और देखें रुख़ उन लोगों का
और देखें रुख़ उन लोगों का
जो हम से रूठ के बैठे हैं
आओ उन की बात सुनें
और सुन लें शायद अपनी बात
रख कर उन के हाथ पे हाथ
कभी तो दिल की बात सुनें
और रहें हम उन के पास
शायद वो भी हों उदास
चलो हवा के साथ चलें
Read Fullआओ उन की बात सुनें
और सुन लें शायद अपनी बात
रख कर उन के हाथ पे हाथ
कभी तो दिल की बात सुनें
और रहें हम उन के पास
शायद वो भी हों उदास
चलो हवा के साथ चलें
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ज़रा अपनी आँखें तो देना
कि देखूँ तुम्हारी नज़र से
कि देखूँ तुम्हारी नज़र से
जहान-ए-तमन्ना
जहाँ लोग कहते हैं
नर्गिस ने इक फूल फिर से जना है
हज़ारों बरस की सज़ा झेल कर
गुमाँ और अफ़्शाँ के रंगों में फिर से
बहारों की ख़ुशबू सफ़र कर रही है
कि लम्हों की लहरों पे हर सू
नई आरज़ू पुर-फ़िशाँ है
तमन्ना की तन्हाइयाँ मुंतज़िर हैं
कि शायद वही वक़्त का क़ाफ़िला
फिर मिले
जो उन को सुला कर बताए बिना चल दिया था
शुक्रिया
अपनी आँखें तो लो
हमें अपनी बे-नूरी अच्छी
हमें क्या मिला
हज़ारों बरस का सफ़र
और फिर
दीदा-वर
ख़ुद-नज़र ख़ुद-गिरफ़्ता
ये पानी के तख़्ते पे लटका हुआ फूल
गुमाँ और अफ़्शाँ के रंगों की हिजरत का
ताज़ा निशाँ
दे गया दाग़-ए-हिजरत की इक दुख भरी दास्ताँ
ये चश्म-ए-तमन्ना
ख़ुदाया ख़ुदी थी कि थी ख़ुद-नुमाई
ये फूलों की दुनिया भी
अंधेर नगरी है
अंधों की दुनिया है
बे-नूर-ओ-बे-ख़ौफ़
इंसाफ़ अंधा है
फूलों को फाँसी के फँदे
Read Fullजहाँ लोग कहते हैं
नर्गिस ने इक फूल फिर से जना है
हज़ारों बरस की सज़ा झेल कर
गुमाँ और अफ़्शाँ के रंगों में फिर से
बहारों की ख़ुशबू सफ़र कर रही है
कि लम्हों की लहरों पे हर सू
नई आरज़ू पुर-फ़िशाँ है
तमन्ना की तन्हाइयाँ मुंतज़िर हैं
कि शायद वही वक़्त का क़ाफ़िला
फिर मिले
जो उन को सुला कर बताए बिना चल दिया था
शुक्रिया
अपनी आँखें तो लो
हमें अपनी बे-नूरी अच्छी
हमें क्या मिला
हज़ारों बरस का सफ़र
और फिर
दीदा-वर
ख़ुद-नज़र ख़ुद-गिरफ़्ता
ये पानी के तख़्ते पे लटका हुआ फूल
गुमाँ और अफ़्शाँ के रंगों की हिजरत का
ताज़ा निशाँ
दे गया दाग़-ए-हिजरत की इक दुख भरी दास्ताँ
ये चश्म-ए-तमन्ना
ख़ुदाया ख़ुदी थी कि थी ख़ुद-नुमाई
ये फूलों की दुनिया भी
अंधेर नगरी है
अंधों की दुनिया है
बे-नूर-ओ-बे-ख़ौफ़
इंसाफ़ अंधा है
फूलों को फाँसी के फँदे
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देखा नहीं वो आदमी तन्हा कहूँ जिसे
वो आज तक मिला नहीं अपना कहूँ जिसे
वो आज तक मिला नहीं अपना कहूँ जिसे
सदियों से इंतिज़ार है उस एक शख़्स का
आए हो कितनी देर से इतना कहूँ जिसे
नज़रें तरस के रह गईं ता-अक्स-ए-आबशार
देखा नहीं है पानी का क़तरा कहूँ जिसे
कौन-ओ-मकाँ में मौजज़न है तेरी आगही
इक लम्हा भी मिला नहीं तेरा कहूँ जिसे
दरिया हूँ मौज बन के रवाँ हूँ तिरी तरफ़
उस पार कोई घर भी है अपना कहूँ जिसे
अफ़्सून-ए-इंतिज़ार तमन्ना का नाम है
हुस्न-ए-तलब में आरज़ू गोया कहूँ जिसे
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पत्ते नहीं कहीं हरी शाख़-ए-शजर नहीं
इस शहर में बहार की कोई ख़बर नहीं
इस शहर में बहार की कोई ख़बर नहीं
रंग-ए-ख़िज़ाँ में लाख मिलाऊँ दिलों के रंग
मौज-ए-शराब-ओ-शे'र में कोई असर नहीं
डूबे पड़े हैं क़ुल्ज़ुम-ए-ख़्वाब-ओ-ख़याल में
मौज-ए-रवाँ कहाँ है किसी को ख़बर नहीं
दरिया में मौज बन के कहाँ तक रहे कोई
मौज-ए-रवाँ ब-सूरत-ए-दीवार-ओ-दर नहीं
अब मंज़िल-ए-वजूद नहीं दिल की काएनात
इस घर में एक मैं हूँ कोई बाम पर नहीं
तू राहत-ए-वजूद है तू रूह-ए-काएनात
इस घर में तू नहीं है तो ये मेरा घर नहीं
दश्त-ए-तलब है ख़त्म यहाँ नाक़ा-ए-निगाह
ये वो ज़मीं है जिस में तुम्हारा गुज़र नहीं
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जो जिस्म के ज़र्रों में ख़ुदा ढूँड रही है
यूसुफ़ की ज़ुलेख़ा में है वो रूह-ए-तपाँ भी
इस मोहर-ए-ख़मोशी में निहाँ रूह-ए-तकल्लुम
इस सोए हुए शहर की है अपनी ज़बाँ भी
हर लहर के सीने से लिपटता है मिरा दिल
मँझधार के इस पार हो साहिल का निशाँ भी
क्यूँ वक़्त की लहरें मुझे ले जाएँ किसी ओर
दाइम दिल-ए-दरिया हूँ मैं मौजों में रवाँ भी
हम ज़ीस्त की सरहद पे मिले मौत से लेकिन
है दश्त-ए-तलब भी वही और मंज़िल-ए-जाँ भी
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फिर है क़ल्ब-ओ-नज़र में यकसूई
काश आ जाए ना-गहाँ कोई
आँख शबनम की देखती है किसे
चाँदनी में हुआ जवाँ कोई
शहर से दूर दिन का फूल खिला
दश्त में भी है गुलिस्ताँ कोई
दिल भी हमराज़-ए-आरज़ू निकला
अब नहीं अपना राज़-दाँ कोई
छोड़ दुख-सुख की मंज़िलों का तवाफ़
दिल मियाँ ढूँड आस्ताँ कोई
दूर अपनों से हो रहे हैं लोग
देखिए कब मिले कहाँ कोई
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मंज़र-ए-होश से आगे भी नज़र जाने दे
जा रहा है ये मुसाफ़िर तो उधर जाने दे
जा रहा है ये मुसाफ़िर तो उधर जाने दे
तेरी आवाज़ की परवाज़ में है मेरा वजूद
अपनी गुफ़्तार के पर्दों में बिखर जाने दे
न कोई चश्म-ए-तमन्ना न कोई दस्त-ए-दुआ'
ज़िंदगी तू मुझे बे-लौस गुज़र जाने दे
तेरे क़ाबिल भी नहीं तेरे मुक़ाबिल भी नहीं
हम-सफ़र साथ मुझे अपने मगर जाने दे
तू तो है हुस्न-ए-अज़ल और मिरा रंग-ए-ग़ज़ल
मेरी आवाज़ में भी कुछ तो असर जाने दे
मेरे अश'आर में सदियों के तलातुम का शुऊ'र
काश तू उन को ज़रा दिल में उतर जाने दे
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