Parkash Fikri

Top 10 of Parkash Fikri

    पहाड़ों से उतरती शाम की बेचारगी देखें
    दरख़्तों पर लरज़ कर बुझ रही हैं आख़िरी किरनें

    बहुत ही सर्द है अब के दयार-ए-शौक़ का मौसम
    चलो गुज़रे दिनों की राख में चिंगारियाँ ढूँडें

    भला पत्थर भी रोते हैं कभी शीशे के ज़ख़्मों पर
    अगर होता है ऐसा तो हिसाब-ए-दोस्ताँ भूलें

    सवाद-ए-शाम में ढूँडें कोई मानूस सा चेहरा
    हवा की रहगुज़र पे एक नन्हा सा दिया रक्खें

    कहाँ अल्फ़ाज़ देते हैं हमारा साथ अब 'फ़िक्री'
    कहे अश'आर सब बे-जाँ हुईं बेकार सब ग़ज़लें
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    ये जो जुगनू हैं या सितारे हैं
    हम में रौशन हैं ये हमारे हैं

    क्या ख़िज़ाँ क्या बहार का झगड़ा
    जितने मौसम हैं हम को प्यारे हैं

    किस के ख़ाके में हम भरें उन को
    रंग फूलों से जो उतारे हैं

    अपने अंदर की राख में अब भी
    जलते बुझते से कुछ शरारे हैं

    बीज बोते हैं जो हवाओं में
    कितने मासूम वो बिचारे हैं

    ख़्वाब-ए-फ़र्दास क्या हमें 'फ़िक्री'
    ऐसे ख़्वाबों से अब किनारे हैं
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    चाँदी जैसी झिलमिल मछली पानी पिघले नीलम सा
    शाख़ें जिस पर झुकी हुई हैं दरिया बहते सरगम सा

    सूरज रौशन रस्ता देगा काले गहरे जंगल में
    ख़ौफ़ अँधेरी रातों का अब नक़्श हुआ है मद्धम सा

    दर्द न उट्ठा कोई दिल में लहू न टपका आँखों से
    कहने वाला बुझा बुझा था क़िस्सा भी था मुबहम सा

    हँसती गाती सब तस्वीरें साकित और मबहूत हुईं
    लगता है अब शहर ही सारा एक पुराने एल्बम सा

    सर्द अकेला बिस्तर 'फ़िक्री' नींद पहाड़ों पार खड़ी
    गर्म हवा का झोंका ढूँडूँ जी से गीले मौसम सा
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    हवा से ज़र्द पत्ते गिर रहे हैं
    किताबों के वरक़ बिखरे पड़े हैं

    इसी पानी में मछली का मकाँ है
    इसी पानी में प्यासे हम मरे हैं

    जहाँ गुलज़ार खिलता था हँसी का
    वहीं चिमगादड़ों के घोंसले हैं

    अंधेरे में डरा देते हैं हम को
    ये कपड़े खूटियों पर जो टँगे हैं

    कभी तो ख़ाक में वो भी मिलेंगे
    अभी जो चाँद से 'फ़िक्री' बने हैं
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    काली रातों में फ़सील-ए-दर्द ऊँची हो गई
    अंधी गलियों में ख़मोशी लाश बन के सो गई

    बर्फ़ से ठंडे अँधेरों की सिसकती गोद में
    मरते लम्हों की उदासी दिल में काँटे बो गई

    शहर की सोती छतें हों या फ़सुर्दा रास्ते
    क़तरा क़तरा गिरती शबनम सब का चेहरा धो गई

    नींद में डूबे शजर से चीख़ते पंछी उड़े
    ख़ौफ़ के मारे हवा में कपकपी सी हो गई

    इस अकेले-पन के हाथों हम तो 'फ़िक्री' मर गए
    वो सदा जो ढूँडती थी जंगलों में खो गई
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    दुश्मनी की इस हवा को तेज़ होना चाहिए
    उस की कश्ती को सर-ए-साहिल डुबोना चाहिए

    छीन कर सारी उम्मीदें मुझ से वो कहता है अब
    किश्त-ए-दिल में आरज़ू का बीज बोना चाहिए

    इस समुंदर की कसाफ़त आँख में चुभने लगी
    उस का चेहरा और ही पानी से धोना चाहिए

    सौंप जाएँ इन दरख़्तों को निशानी नाम की
    हम कभी थे अगली रुत को इल्म होना चाहिए

    ये भी कोई तुक हुई कि कुछ हुआ तो रो पड़े
    शख़्सियत का रंग 'फ़िक्री' यूँ न खोना चाहिए
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    मुझे तो यूँ भी इसी राह से गुज़रना था
    दिल-ए-तबाह का कुछ तो इलाज करना था

    मिरी नवा से तिरी नींद भी सुलग उठती
    ज़रा सा इस में शरारों का रंग भरना था

    सुलगती रेत पे यादों के नक़्श क्यूँ छोड़े
    तुझे भी गहरे समुंदर में जब उतरना था

    मिला न मुझ को किसी से ख़िराज अश्कों में
    हवा के हाथों मुझे और कुछ बिखरना था

    उसी पे दाग़ हज़ीमत के लग गए देखो
    यक़ीं की आग से जिस शक्ल को निखरना था

    मैं खंडरों में उसे ढूँडता फिरा 'फ़िक्री'
    मगर कहाँ था वो आसेब जिस से डरना था
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    आँधियाँ आती हैं और पेड़ गिरा करते हैं
    हादसे ये तो यहाँ रोज़ हुआ करते हैं

    उन के दिल में भी कोई खोज तो पिन्हाँ होगी
    ये परिंदे जो हवाओं में उड़ा करते हैं

    ख़ून का रंग लिए गर्म धुएँ के बादल
    सर्द अख़बार के सीने से उठा करते हैं

    इन अँधेरों में कोई राह तो रौशन होती
    ये सितारे तो हर इक रात जला करते हैं

    हार के ज़ख़्म कभी जीत की लज़्ज़त भी कभी
    हम तसव्वुर में कई खेल रचा करते हैं

    जिन के चेहरों पे कोई धूप न साया कोई
    उन मकानों में अजब लोग रहा करते हैं

    दिन के सहरा में जिसे ढूँड न पाएँ 'फ़िक्री'
    शब के जंगल में वो आवाज़ सुना करते हैं
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    कहाँ कहाँ से गुज़र रहा हूँ
    मैं आँधियों में बिखर रहा हूँ

    किसी भी सूरत न चैन पाऊँ
    ये किस तजस्सुस में मर रहा हूँ

    मैं सुर्ख़ियों में कहाँ से होता
    मैं हाशिए की ख़बर रहा हूँ

    सभों को जाना है पार लेकिन
    मैं पार जाने से डर रहा हूँ

    न मेरी मंज़िल न कोई जादा
    अज़ल से गर्द-ए-सफ़र रहा हूँ

    मुझे तो मरना था ग़म में 'फ़िक्री'
    मैं ग़म में जल कर निखर रहा हूँ
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    शबनम भीगी घास पे चलना कितना अच्छा लगता है
    पाँव तले जो मोती बिखरें झिलमिल रस्ता लगता है

    जाड़े की इस धूप ने देखो कैसा जादू फेर दिया
    बेहद सब्ज़ दरख़्तों का भी रंग सुनहरा लगता है

    भेड़ें उजली झाग के जैसी सब्ज़ा एक समुंदर सा
    दूर खड़ा वो पर्बत नीला ख़्वाब में खोया लगता है

    जिस ने सब की मैल कसाफ़त धोई अपने हाथों से
    दरिया कितना उजला है वो शीशे जैसा लगता है

    अंदर बाहर एक ख़मोशी एक जलन बेचैनी से
    किस को हम बतलाएँ आख़िर ये सब कैसा लगता है

    शाम लहकते जज़्बों वाली 'फ़िक्री' कब की राख हुई
    चाँद-रू पहली किरनों वाला दर्द का मारा लगता है
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