ये जो जुगनू हैं या सितारे हैं
हम में रौशन हैं ये हमारे हैं
क्या ख़िज़ाँ क्या बहार का झगड़ा
जितने मौसम हैं हम को प्यारे हैं
किस के ख़ाके में हम भरें उन को
रंग फूलों से जो उतारे हैं
अपने अंदर की राख में अब भी
जलते बुझते से कुछ शरारे हैं
बीज बोते हैं जो हवाओं में
कितने मासूम वो बिचारे हैं
ख़्वाब-ए-फ़र्दास क्या हमें 'फ़िक्री'
ऐसे ख़्वाबों से अब किनारे हैं
— Parkash Fikri















