कोई सरमाया कब रहा महफ़ूज़
इक फ़क़ीरी का रास्ता महफ़ूज़
गोशा-ए-दिल है आलम-ए-हैरत
बड़ा मा'मूर है बड़ा महफ़ूज़
दश्त फिर क्यूँ नहीं रहे आबाद
अब्र आज़ाद है हवा महफ़ूज़
कश्मकश में है ताइर-ए-फ़िरदौस
ज़मीं आबाद और ख़ला महफ़ूज़
जो हवा की पनाह में आए
वही रह जाएगा दिया महफ़ूज़
— Yahya Khan Yusuf Zai















