नहीं ऐसा कि मैं नस काट लूँगा
हाँ ग़म में ज़िंदगी बस काट लूँगा
तू ख़ुश रहना मेरी चिंता न करना
कि ऐसे ज़ीस्त और दस काट लूँगा
मेरी बातें दे गर दुख तो बताना
मैं तब नस हो के बेबस काट लूँगा
मिलाया हाथ था तो सोच कर उम्र
छुआ लोहे ने पारस काट लूँगा
— 100rav
हाँ ग़म में ज़िंदगी बस काट लूँगा
तू ख़ुश रहना मेरी चिंता न करना
कि ऐसे ज़ीस्त और दस काट लूँगा
मेरी बातें दे गर दुख तो बताना
मैं तब नस हो के बेबस काट लूँगा
मिलाया हाथ था तो सोच कर उम्र
छुआ लोहे ने पारस काट लूँगा
Other ghazal from the same pen
Shers of budhapa.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling