un dinon kya khoob tha haan aadmi ka zaviya | उन दिनों क्या ख़ूब था हाँ आदमी का ज़ाविया

  - 100rav

उन दिनों क्या ख़ूब था हाँ आदमी का ज़ाविया
सुन के ही खुल जाता था हर शाइरी का ज़ाविया

इक चमन जब सूख कर सहरा हुआ तो जाना ये
मौत समझाती है इक दिन ज़िंदगी का ज़ाविया

जब किसी दिन नज़्म में पाओगी अपना नाम तुम
दिल में छप जाएगा मेरी आशिक़ी का ज़ाविया

ताज़ा शादी है तो कुछ दिन प्यार होगा दरमियाँ
साल ज़ाहिर कर ही देगा मुफ़्लिसी का ज़ाविया

हुस्न की तश्ख़ीस करके काँच चमकाते हो जो
देखो टायर तो खुलेगा मेहनती का ज़ाविया

हैराँ हैं सब कैसे चालू हो गई बिगड़ी घड़ी
उसका आना समझा देगा इस घड़ी का ज़ाविया

आप लोगों के मुक़ाबिल अब ग़ज़ल सौरभ पढ़े
है ख़बर जुगनूँ को क्या है मुक्तसी का ज़ाविया

  - 100rav

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