"क़िस्मत"
एक बच्चे की हथेली से फिसलती
रेत में तिनका ज़मीं में जा मिलेगा
पर अनोखी बात होगी
जब इसी क़िस्से से पहले अदना सा वो
एक तिनका यूँ रचाए स्वाँग जिस से
शाम के सूरज से सबके सामने ही
इक किरण झट से चुरा ले जाए उस की
बात अनहोनी है लेकिन ये करिश्मा
है उसी तिनके के हिस्से तो मुझे फिर
क्यूँ नहीं उस एक तिनके से जलन हो
क्यूँकि रिसती रेत जितना भी नहीं मैं
तेरे हिस्से
और ढलती शाम जितना भी नहीं तू
मेरे हिस्से
— kapil verma















