"तसलसुल"

इस अनजान सफ़र में डर है
दूर बहुत निकल आया हूँ मैं
दूर भी इतना
मैं ने होश-ओ-हवा से की हद तक
पार की है

जाते लम्हों वाली ट्रेन में देखूँ जब
गुम-सुम से बैठे ख़ुद को तो
दौड़ लगा कर खिड़की से ही
ढाढस की इक चाय के साथ
काग़ज़ पर लिख कर कुछ नज़्में
दे आता हूँ अक्सर ख़ुद को

वैसे ट्रेन की इस बोगी में
कुछ बुत जैसे लगने वाले
लोग भी बैठे रहते हैं
इनसे जब पूछो कि कहाँ तक
पहुँचे हैं
तो भी कुछ न बताते हैं ये
बड़े अजीब से हैं ये सब लोग
वो तो छोड़ो गाहे-गाहे
लोग ये जाने क्यूँ इक दम से
शक्ल तुम्हारी ले लेते हैं

एक अजब सी राह में हूँ मैं
अब तो समझने की कोशिश भी
छोड़ चुका हूँ
इतना सा ही समझ आता है
दूर बहुत निकल आया हूँ मैं
दूर भी इतना
ज़ेहन से गुम ये हो जाता है
ट्रेन भला है कौन सी आख़िर
ट्रेन ख़्यालों वाली है ये
ख़्वाबों की है या लम्हों की

ख़ैर मुझे परवाह नहीं है
जो भी हो मैं ने तो बस
इतना ही जाना है इक दिन
सरपट धुआँ सा इन साँसों का
भरती हुई ये ट्रेन यकायक
रुक जाएगी
जैसे बे-मतलब ही किसी ने
इस की चैन को खींच दिया हो

उस दिन से पहले तुम आना
हवा का झोंका सा बनकर और
तब मेरी ये नींद उड़ाकर
ट्रेन तुम्हारे लम्हों की है जो उस
में
अपने साथ बिठा लेना

दरअस्ल ऐसा है मुझ को
इस अनजान सफ़र में डर है
दूर बहुत निकल आया हूँ मैं
दूर भी इतना
मैं ने होश-ओ-हवा से की हद तक
पार की है

— kapil verma

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