कौन हैं जो झूठे सपने सजाए बैठे हैं
आरज़ू वफ़ा की तुम से लगाए बैठे हैं
माना नासमझ था मैं तो यहाँ मोहब्बत में
पर यहाँ तो सब आशिक़ धोखा खाए बैठे हैं
आज फिर बड़ी रौनक है मेरे इलाक़े में
लगता है वो बाहर महफ़िल लगाए बैठे हैं
ग़म बहुत हमारे दिल ने सहा मगर देखो
चेहरे पे हँसी ले कर सब छुपाये बैठे हैं
फ़न ख़ुदा ने ऐसा भी क्या 'अतुल' दिया तुम को
लोग क्यूँ तुम्हारी बातों में आए बैठे हैं
— ATUL SINGH















