Aditya
Aditya
Ghazal

बस्ती जंगल शहर समुंदर एक ही धुन में गाते हैं

जब उस की यादों के सावन दिल में खिलने आते हैं

दिल की बगिया में उस की यादों के सावन खिलते हैं
तितली सज कर आती है फिर भँवरे भी मुस्काते हैं

बातों ही बातों में जब वो मुझ को अपना कहती है
मंज़िल अपनी लगती है सारे रस्ते खुल जाते हैं

उस के सादापन की तो ये क़ुदरत भी दीवानी है
आहू उस के बालों में कंघी करने को आते हैं

जब उस के घुँघराले से बालों में कंघी फँसती है
सूरज मद्धम हो जाता है काले बादल छाते हैं

अपने होंटों से वो हवाएँ चूम के भेजा करती है
वो पैग़ाम परिंदे फिर मेरी टैरिस पर लाते हैं

उस की निगाहों की तासीरें क्या समझाऊँ कैसी हैं
उस को देखने वाले हैं जो देखते ही रह जाते हैं

दिल कहता है गीत बना कर ता'उम्र उसे मैं गाऊँ
दिल के अरमाँ लेकिन बाहर आने से घबराते हैं

— Aditya

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