bastii jungle shahar samundar ek hi dhun men gaate hain | बस्ती जंगल शहर समुंदर एक ही धुन में गाते हैं

  - Aditya

बस्ती जंगल शहर समुंदर एक ही धुन में गाते हैं
जब उसकी यादों के सावन दिल में खिलने आते हैं

दिल की बगिया में उसकी यादों के सावन खिलते हैं
तितली सज कर आती है फिर भँवरे भी मुस्काते हैं

बातों ही बातों में जब वो मुझको अपना कहती है
मंज़िल अपनी लगती है सारे रस्ते खुल जाते हैं

उसके सादापन की तो ये क़ुदरत भी दीवानी है
आहू उसके बालों में कंघी करने को आते हैं

जब उसके घुँघराले से बालों में कंघी फँसती है
सूरज मद्धम हो जाता है काले बादल छाते हैं

अपने होटों से वो हवाएँ चूम के भेजा करती है
वो पैग़ाम परिंदे फिर मेरी टैरिस पर लाते हैं

उसकी निगाहों की तासीरें क्या समझाऊँ कैसी हैं
उसको देखने वाले हैं जो देखते ही रह जाते हैं

दिल कहता है गीत बनाकर ता'उम्र उसे मैं गाऊँ
दिल के अरमाँ लेकिन बाहर आने से घबराते हैं

  - Aditya

Environment Shayari

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