देर वीराने में आवाज़ लगाते रहे हम
उस को आना नहीं था फिर भी बुलाते रहे हम
माँगने वालो को बस दी हैं दुआएँ हम ने
लूटने वालो पे तो जान लुटाते रहे हम
गिर गई गोद में चुप के से बुढ़ापे की हयात
हिज्र बचपन का जवानी में मनाते रहे हम
उस हथेली से उतर भी गया मेंहदी का रंग
अपने दामन से वो इक दाग़ मिटाते रहे हम
मौत की रस्सी का गर्दन में फँसा कर फंदा
ज़िंदगी नाम के दरिया में नहाते रहे हम
— Aditya Singh aadi














