ऐसे उलझ गया हूँ किसी के सवाल में
दिल आ नहीं रहा है अभी इस्तिमाल में
इक रोज़ मुझको इश्क़ का ऐसा सिला मिला
आया नहीं था जो कभी मेरे ख़याल में
सच बोलने का मुझको यही इक सिला मिला
दुश्मन बना लिए थे कई बोल चाल में
मैं उसकी आँखें देख के बस देखता रहा
उसको हवस दिखी थी हमारे विसाल में
जाने पे उसके आँख से आँसू नहीं गिरे
पत्थर बना दिया था मुझे देखभाल में
तुम नें हज़ार ज़ुल्म किए मुझ पे दोस्तों
तुम भूल से न आना मेरे इन्तेक़ाल में
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