jhamaajham men kuchh bhi nahin ho raha | झमाझम में कुछ भी नहीं हो रहा

  - Aqib khan

झमाझम में कुछ भी नहीं हो रहा
ये मौसम में कुछ भी नहीं हो रहा

ले तो आए मुझको भगा कर मगर
रकम कम में कुछ भी नहीं हो रहा

नहीं हो रहीं हम सेे ग़ज़लें भी और
इसी ग़म में कुछ भी नहीं हो रहा

उधर दोस्त चाहें कहानी नई
इधर हम में कुछ भी नहीं हो रहा

मैं कोशिश करूँँ? बोल कितनी दफा
याँ पैहम में कुछ भी नहीं हो रहा

बताया गया मर्द रोते नहीं
सो मातम में कुछ भी नहीं हो रहा

ख़बर है फ़क़त वो भी झूठी ख़बर
कि ऊदम में कुछ भी नहीं हो रहा

  - Aqib khan

Dost Shayari

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