sab barabar karna hai to phir tu mujhko ye bataa | सब बराबर करना है तो फिर तू मुझको ये बता

  - Aqib khan

सब बराबर करना है तो फिर तू मुझको ये बता
बदले में तुझपर यकीं के मुझको आख़िर क्या मिला

दोनों की मर्ज़ी थी शामिल दोनों ने वादे किए
फिर बिछड़ने पर मिलेगी क्यूँ फ़क़त इक को सज़ा

तुम हो अच्छे लोग सो अब तुम दुआएँ दो उसे
जब भी उसकी बात होगी मैं तो दूँगा बद्दुआ

साथ में मिलकर चलो फिर से गुज़ारें ज़िन्दगी
कम सुनाई दे रही है फिर से बोलो क्या कहा

कुछ नहीं बदला ज़माने के बदल जाने से भी
फ़िर से इक डोली उठी फिर शख़्स इक पागल हुआ

मैं नुजूमी तो नहीं हूँ पर बता सकता हूँ मैं
तू है जितना ख़ूबसूरत उतना ही है बेवफ़ा

  - Aqib khan

Dushman Shayari

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