ज़माने में नहीं कुछ बस तुम्हारा साथ काफ़ी है
बिताने को अवध की शाम, ये सौग़ात काफ़ी है
इरादा है अभी मेरा क्षितिज तक साथ चलने का
रहे हाथों में मेरे बस तुम्हारा हाथ काफ़ी है
सुना दो जो सुनानी हो गुनाहों की सज़ा मेरे
अदालत हो तुम्हीं तो अब तुम्हारी बात काफ़ी है
हमेशा याद आएगी मुझे हर पल तुम्हारे बिन
गुज़ारी थी गुज़िश्ता साल जो, वो रात काफ़ी है
ज़रूरत ही नहीं अनुबंध पत्रों की मुझे तो अब
कही जो बात है मैंने मियाँ वो बात काफ़ी है
मुहब्बत में अलग करने पे आमादा ज़माना है
नहीं कुछ और बस इनके लिए तो ज़ात काफ़ी है
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