यतीम आँखें

हमारी आँखें न जाने कब से ये मुंतज़िर हैं
इसी तरह से
अभी तलक है इन्हें भरोसा
कि जो गए थे पलट के वापस वो आ रहे हैं
मगर करूँ क्या
यतीम आँखें ये बेसहारा कोई भी इनका यहाँ नहीं है
है इन की ख़्वाहिश वो एक चेहरा
जो सब से प्यारा जो मन को भाए
जो दिल को दिल के क़रीब लाए।
मगर करूँ क्या वो एक चेहरा कहाँ से लाऊँ

ये बात अपनी जगह सही है
कि कोई आँखें यतीम कैसे
मगर बताऊँ तुम्हें हक़ीक़त
ये कहने को हैं हमारी आँखें हमारा क्या है
हमारा इन
में तो कुछ नहीं है
मैं ख़ुद अभी तक था यक ज़रीया
जो इनको सब कुछ दिखा रहा था
मगर करूँ क्या
ये बेबसी है कोई भी चेहरा कोई भी मंज़र कहीं नहीं है
जो इनको भाए
जो दिल को दिल के क़रीब लाए

ये बात अपनी जगह सही है
हमारी दुनिया बहुत से चेहरों का एक जंगल
मगर ये आँखें हमारी आँखें यतीम आँखें
इन्हें अँधेरा ही दिख रहा है
न कोई मंज़र न कोई चेहरा
न कोई जंगल न कोई सहरा
हमारी आँखें ये आस में हैं ये उन की ही बस तलाश में हैं
कि जो गए थे पलट के वापस वो आ रहे हैं
अभी तलक वो
हमीं से रिश्ता निभा रहे हैं
वो आ रहे हैं वो आ रहे हैं वो आ रहे हैं

— Prashant Arahat

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