"मैं और तुम"
हम दोनों मुस्तकबिल में एक होना चाहते थे
मैं इस ख़याल से डरती थी और वो दुआ माँगते थे
वो मुझे हर घड़ी और मोड़ पे सँभालता था
मगर दोनों डरते थे क्योंकि दोनों अलग मज़हब से थे
इश्क़ में इतनी पाबंदी है क्यूँ
मैं इसी सोच में रोया करती थी
आँख से आँसू बहते थे
तकिए को भिगोया करती थी
और वो भी इसी सोच में परेशान था
मैं हिंदू थी और वो मुसलमान था
साथ होकर कभी अलग होंगे
यार फिर साथ में ग़लत होंगे
डाँटती थी उसे बराबर दिन
और वो चुप मुझे अजब होंगे
उस के घर वाले मान जाते
लेकिन मेरा घर मुझे मार देता
मैं अगर उस की नहीं होती
एक दिन वो ख़ुद को हार देता
इस लिए हम दोनों एक अच्छी नौकरी चाहते थे
नौकरी होगी तो सब मान आई जाएँगे ये हम मानते थे
लेकिन हमें पता नहीं था हमारे साथ आगे क्या होगा
या फिर हम उस के रहेंगे भी या वो मुझ से जुदा होगा
दोनों डरते थे समाज के है एक इंसान से
लोग कहते थे धोखा मिलता है मुसलमान से
हम एक दूजे को अच्छे से समझते थे लेकिन
सारा जमाना हमारे ख़यालों से अनजान था
फ़र्क़ इतना था बस
मैं हिंदू थी और वो मुसलमान था















