कोई तो सदमा लगा है ज़रूर मुझ को भीथकन शदीद है और नींद भी उड़ी हुई हैनजूमी तकते हैं बेचारगी से मेरी तरफ़लकीर माथे पे जितनी भी थी मिटी हुई है— Ashraf Ali