हर मिलने वाले में बसी हैं काम की चालाकियाँ

आने लगी मुझ को समझ आवाम की चालाकियाँ

वो है नहीं फिर भी मुझे दिखने लगा है हर जगह
ऐसे मिरे पीछे पड़ी हैं जाम की चालाकियाँ

गालों को उस के यूँ शफ़क़ ने छू लिया पहले मिरे
देखो है कितनी ख़ूब-सूरत शाम की चालाकियाँ

भेजा था मैं ने इक अधूरा दिल उसे ये सोच कर
शायद वो कुछ समझे मिरे पैग़ाम की चालाकियाँ

पेंसिल से ले कर वक़्त तक अपना सभी को है दिया
बचपन से मुझ में रह गईं बस नाम की चालाकियाँ

— Bhoomi Srivastava

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