अकेली दुनिया
मैं अपनी एक छोटी-सी दुनिया बनाऊँगी
जहाँ मैं खुल कर रो सकूँगी हँस सकूँगी
जहाँ न किसी की बेरुख़ी से मेरा दिल दुखेगा
न किसी को मेरी मौजूदगी की रंजिश होगी
उस दुनिया में सिर्फ़ एक छाया मौजूद होगी
जो रौशनदान से आती हुई-सी धूप होगी
वो मेरे गालों को सहलाएगी मुझ से बातें करेगी
मेरे साथ रहेगी तब तक जब तक आसमान में सूरज होगा
शाम ढलते ही मुझे अँधेरे में रहना सिखाएगी
उस छोटी-सी दुनिया इस दुनिया से बहुत परे होगी
उस दुनिया में मैं एक आईना रखूँगी
जिस पर मैं देर तक मुस्कुराने का रियाज़ करूँगी
और तमाम घाव के निशाँ जो मुझे मेरे अपनों ने दिए हैं
उस आईने को दिखाती रहूँगी
दिखाती रहूँगी याद कराती रहूँगी
ताकि भूल से भी मैं वो फ़रेबी झूठी छलने वाली दुनिया में न चली जाऊँ
मैं उस दुनिया में रखूँगी अपनी ज़िंदगी की एक किताब
जिसे मैं रोज़ाना पढ़ूँगी
और देखूँगी कि मेरी ज़िंदगी की कहानी में एक भी किरदार ऐसा था क्या
जिस ने माना हो मुझ को अपना बेशक़ीमती हिस्सा
वो हिस्सा जिस को सच में तलाश होगी कि कौन-सी दुनिया में चली गई
वो हँसने-खेलने वाली लड़की सब को अपना मानने वाली लड़की
हो सकता है कि मिल जाए कहीं-न-कहीं एक-दो किरदार
जो मुझे उस जालीनुमा मक्खियों की आवाज़ों वाले
टूटे-फीके कमरे से बाहर ले आए
क्योंकि मैं ख़ुद से कभी इस बे-मुहब्बत-सी दुनिया में लौट कर नहीं आऊँगी
ऐन मुमकिन है कि मैं छोटी-सी दुनिया बनाऊँगी















