ज़िंदगी मनती ही नहीं मुझ सेे
इतनी नाराज़ थी नहीं मुझ से
आईने टूटे थे कभी सो अब
रूठने को कोई नहीं मुझ से
तुम न मिलते रहे तो मेरी भी
शक्ल अब मिल रही नहीं मुझ से
अब शिकायत तेरी ख़ुशी से है
अब तू नाराज़ भी नहीं मुझ से
अपनों को मैं ग़ुलाम लगता था
नौकरी जब हुई नहीं मुझ से
— Chetan















